किसान आरक्षण प्रस्ताव


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विषय: प्रगतिशील किसान शैलेश अग्रवाल द्वारा संकल्पित किसानों के लिए दीर्घकालिक विकासात्मक उपाय-योजनाओं हेतु आरक्षण का (आश्वस्त संरक्षा का) प्रस्ताव।

आदरणीय महोदय,

किसानों के लिए दीर्घकालिक विकासात्मक उपाय हेतु कदम उठाने की गंभीर आवश्यकता है, किंतु ये उपाय-योजनाएँ क्या हो, इस सबंध में अभी तक भ्रम की स्थिति बनी हुई है। इस प्रकार की स्थिति स्वतंत्रता के पश्चात सामाजिक असमानता के संबंध में रही और इस हेतु आदरणीय डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने संविधान के अधीन रहते हुए आरक्षण का उपाय सुझाया था। आज इसी के परिणामस्वरूप सामाजिक असमानता कम हो सकी है, परंतु यही सामाजिक असमानता की स्थिति आज किसानों के मामले में देखी जा सकती है। किसानी से दूर होते जा रहे किसान को यदि बचाना है और पुनः किसानी की ओर उसके रुझान को प्रोत्साहित करना है,तो उसे आरक्षणरूपी दीर्घकालिक संरक्षण प्रदान करने की आवश्यकता है। समाज की मुख्यधारा से जोड़ने हेतु आज इस पीड़ित, शोषित, सामर्थ्यहीन किसान वर्ग/समाज की अनदेखी हितकारी नहीं होगी। वर्तमान में किसानों की हो रही यह दुर्दशा भविष्य में मानव-जाति के अध:पतन का कारण बनने से पहले इस मुद्दे पर अतिमहत्वपूर्ण निर्णय तत्काल, अविलंब लिए जाने की नितांत आवश्यकता है। इस मुद्दे को केवल सरकार की ज़िम्मेदारी मानने से काम नहीं चलेगा, इस ओर सर्वांतर्विष्ठ समाज यंत्रणा से सहयोग प्राप्त करना भी आवश्यक है। किसानों को केवल कर्ज-माफी, न्यूनतम समर्थन मूल्य, पेन्शन आदि देने भर से काम नहीं चलेगा। 7/12 का अधिकार किसान का ही हो, यह आज मानव-जाति की ही नहीं,बल्कि संपूर्ण जीव सृष्टि की आवश्यकता है। किसानों को हम चाहे कितने ही अच्छे स्तर की प्रजाति के बीज और खाद उपलब्ध करा ले, लेकिन खेती करने वाला किसान ही नहीं बचेगा, तब इस सब का क्या लाभ?


कृषि, अत्यधिक कठोर श्रम-अपेक्षित व्यवसाय है। 5 से 50 लाख रुपये तक की कीमत की जमीने और उसकी खेती, बीज, खाद, मजदूरी का निवेश और कमरतोड़ मेहनत, निम्न स्तरीय एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रतिकूल जीवन पद्धति और इस सब के बावजूद भी मुनाफे की कोई गारंटी नहीं होती, बल्कि नुकसान की गारंटी शतप्रतिशत रहती है। समाज में किसान की कोई प्रतिष्ठा या साख नहीं है। किसान परिवार से बेटी-व्यवहार तक के लिए कोई तयार नहीं होता। और इसमें कुछ गलत भी नहीं है। कोई भी माता-पिता अपनी बेटी को दुख और पीड़ा में नहीं देखना चाहेंगे। परिवार के उच्चशिक्षित सदस्य, घर के बड़े-बूढ़ों को समझा-बुझा कर जमीने बेच कर बड़ी संख्या में नौकरी या अन्य व्यापार के लिए शहरों की ओर पलायन कर चूकें हैं। आर्वी से नागपूर की यात्रा हम वर्षों से नित्य करते आ रहे हैं। पहले हम जब भी नागपूर जाते, तब थोड़े-बहुत गड्ढोंभरा दो-लेन का रास्ता था और रास्ते के दोनों ओर जहाँ तक नजर डालें वहाँ तक संतरें एवं अन्य फसलों के खेत के लुभावने दृश्य दिखाई देते। आज उन रस्तों को फोर-लेन सड़कों में बदल कर उनका सौंदर्यीकरण तो कर दिया गया है, लेकिन प्रकृति के रूप को भौंडा बना दिया गया । सड़कों के दोनों ओर बंजर जमीने हमें आने वाले प्राकृतिक संकटों का चलचित्र दिखा रही हैं,लेकिन उनके संकेतों को समझने का समय किसी के पास नहीं हैं। मनुष्य, सुंदर सड़के देख कर अपने विकास कार्य की शेख़ी बघारने में ही खुश है और प्रकृति उसके आने वाले कल के अध:पतन को लेकर चिंतित है, जो बंजर खेतों में फैले सन्नाटे में दिखाई दे रहा है।


कृषि उद्योग का वहन करने में असमर्थता और ज़मीनों की अच्छी-ख़ासी कीमत मिलने के कारण किसानों ने आराम का जीवन चुना तथा जमीने बेच दी। ये सारी जमीने पूँजीपतियों और धनकुबेरों ने खरीदी। क्या इस प्रकार से कृषि समाज समाप्त कर जमीने पूँजीपतियों को ही सौपी जानी है? क्या किसानों और उनकी पढ़ी-लिखी पीढ़ी का रुझान कृषि की ओर बढ़ाने हेतु कोशिशें जरूरी नहीं है? जिस उद्योग में जी-तोड़ शारीरिक परिश्रम के बावजूद भी आय की निश्चितता नहीं है, ऐसा उद्योग कौन करना चाहेगा? क्या इस कृषि उद्योग की समाज को कोई आवश्यकता नहीं है?महोदय, मैं विनम्रतापूर्वक पूछना चाहता हूँ कि कृषि उत्पादन के बिना हमारा काम चल जाएगा परंतु सड़क, निर्माण कार्य, मेट्रो सेवा, हवाई सेवा, डिजिटल इंडिया ये सब हमारे लिए ज्यादा जरूरी है? क्या इससे यह अनुमान लगाया जाए कि कृषि और किसानों के लिए धन और समय देना इसकी बरबादी मानी जा रही है, लेकिन कृषि के बजाए बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स को अधिक महत्वपूर्ण एवं आवश्यक माना जा रहा है? परिवार का कर्ता-धरता ICU में भर्ती है और उसकी दवादारु पर खर्च करने के बजाए उसके लिए सुंदर वस्त्र, अच्छी गाड़ी और तीर्थयात्रा की तयारी पर खर्च करने जैसा व्यवहार हमारी समझ से परे है। आज कृषि महोत्सवों से कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। आज किसानों को सीधी आर्थिक मदत प्रदान कर आर्थिक समस्या के जंजाल से छुड़ाना आवश्यक है। पैकेज के रूप में अप्रत्यक्ष या अन्य दूसरी तरह की कृषि आधारित पूंजी निवेश का किसान की दृष्टि में कोई महत्व नहीं। हम किसान बहुत ज्ञानी नहीं है; शायद आप हमारी समस्याएँ और उसपर यथायोग्य उपाय संभवत: हमसे अधिक अच्छे से जानते हैं, लेकिन यह कह सकते हैं कि आज हमारी अवस्था के लिए शिघ्रातिशीघ्र उपाय करना अत्यंत आवश्यक है।


लहलहाती फसल कब ओले, आँधी, अतिवृष्टि, रोग आदि के कारण नष्ट हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। किस्मत से इन सभी प्राकृतिक समस्याओं से किसान सही-सलामत बच कर निकल भी आए, तो उसके उत्पादन को उचित मूल्य प्राप्त हो इस बात की कोई गारंटी नहीं होती। उत्पादन होने पर भी किसान भूखा रहेगा उत्पादन न होने पर भी भूखा ही मरेगा, क्योंकि किसान जमीन में कोई भी बीज डाले उगेगा कर्जा ही, आज यही एक शाश्वत सत्य बन गया है। स्वतंत्रता के बाद चौथी पीढ़ी आज कृषि उद्योग में जुटी है। पहली तीन पीढ़ियों ने कर्जे के सहारे किसी तरह गुजारा कर लिया, लेकिन चौथी पीढ़ी की कर्ज लेने की क्षमता क्षीण हो चुकी है। इसलिए उसके पास आत्महत्या के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। जनसंख्या बढ़ती गई। परिवार में कमाने वाला एक और खाने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ गई। नाममात्र आय, जमीन जितनी थी, उतनी ही रही, जो टुकड़ों में बँटती गई। इन जमीनो के छोटे-छोटे टुकड़ों पर कृषि करना नुकसानदायी होता है, इसलिए हानी ही होती है। कृषि अर्थशास्त्र कहता है कि जितनी छोटी जमीन उतना प्रति एकड उत्पादन का खर्च अधिक। एक ओर लोगों को अनाज सस्ते दामों पर में मिल सके,इसलिए सरकार की कृषि उत्पादन की कीमतों में गिरावट लाने वाली योजनाएँ और दूसरी ओर छोटी ज़मीनों पर कृषिकर्म, कर्ज में डूबा किसान, परिवार में सदस्यों की अधिक संख्या, इस सब में किसान बुरी तरह से पिस रहा है।


वर्तमान में किसान आत्महत्या की समस्या पर भी चर्चा ज़ोरों पर है। इस समस्या को सुलझाने के उद्देश्य से विद्वानों द्वारा खोजे गए कारण और उपाय सुनकर किसान समाज के मन में ‘किसान मरता है, तो मरने दीजिए, लेकिन इसकी कारण मीमांसा करना और उपाय सुझाना बंद कीजिए’ इस प्रकार खीजनुमा प्रतिक्रीया आने लगी। किसान आत्महत्या की पीड़ा से अधिक उनकी ऐसी प्रतिक्रीया मन को अधिक आहत और लहूलुहान करने वाली है। किसान आलसी या कामचोर है, ऐसा जो भी महाज्ञानी सोचते हैं, वे सब महानुभाव कम-से-कम एक बार कुछ दिन आकर किसानों के साथ (साहुकार के या किसी नेता के बंगले पर नहीं) गुजार कर देख लें। इसके बिना किसान कौन है, वह कैसे जीवनयापन करता है, और कितना, कैसे परिश्रम करता है, इसका अनुभव करना असंभव है। नींद, भोजन और अन्य शारीरिक नित्यकर्म हेतु लगने वाला समय यदि छोड़ दिया जाए, तो बचे हुए समय में किसान क्या करता है? स्विमिंग करने जाता है? क्रिकेट या सिनेमा देखने जाता है?पत्नी को लेकर बगीचे में घूमने जाता है? बियरबार में जाता है? बारबालाओं का नाच देखने जाता है या मेलोमें/ बाजार में घूम आता है? उन महानुभावों को सबसे पहले इस प्रश्न का उत्तर खोजने की आवश्यकता है। (और यदि इन प्रश्नों के उत्तर हाँ हैं,तब भी क्या अंतर पड़ता है? सभी सुख सुविधाओं का उपभोग करने वाले हमारे जैसे भोगवादी लोग क्या आत्महत्या करते हैं?)


खेती का बैल भी 120 से 140 दिन काम करता है, लेकिन किसान को 365 दिन काम करना पड़ता है। बाप मर जाए तब भी उसे अर्थी पर पड़ा छोड़ कर बैलों का चारा-पानी, गोबरादि करने जाना ही होता है। बच्चा भले ही बुखार में तपता रहे या उसे गैस्ट्रो भी हो जाए, तब भी किसान बुआई नहीं रोक सकता। यह वास्तविकता इन महानुभावों को कब ज्ञात होगी? इस सब के बावजूद भी यदि इन महान विद्वानों,महानुभावों को किसान आलसी और कामचोर दिखाई देता है, तो निम्न वैज्ञानिक पद्धतियों के अनुसरण से वे अपने मन की तसल्ली कर लें। आत्महत्या करने वाले किसान के घर जा कर –


१)पार्थिव शरीर का वजन कर ऊँचाई नाप लें। वजन और ऊँचाई का रेशो निकालें और डॉक्टर को दिखा कर उससे सलाह जरूर लें कि मरने वाला स्वस्थ था या कुपोषित, परिश्रमी था या कामचोर ।

२) चेहरे का एक क्लोजअप फोटो निकालें और उसकी जाँच कर मृत व्यक्ति के चेहरे पर मृत्यु से पहले क्या भाव रहें होंगे, उसकी मानसिक स्थिति क्या रही होगी,इसका रिपोर्ट मंगवाएँ।

३) उसके घर के कपड़े-लत्ते, ओढ़ना-बिछौना, बर्तन आदि की सूची बनाई जाए और उसके आधार पर मृत व्यक्ति मितव्ययी था या अपव्ययी, इसका अंदाजा लगा लें।

४) शराब पीने की लत के कारण किसान आत्महत्या करता है, ऐसा कुछ लोगों का मानना है। यदि ऐसा है तो वह कोनसी शराब पीता है? गावठी, देसी या इंग्लिश,इसका भी पता लगाया जाए। गावठी, देसी, और इंग्लिश शराब की कीमत पता कर ली जाए। प्रति व्यक्ति खर्च के तुलनात्मक आंकड़े निकले जाएँ। किसान और अन्य शराबियों में आत्महत्या के आंकड़े प्राप्त किए जाएँ और गैरकृषि शराबी एवं ‘शराबी किसानों’ के आंकड़े निकाल कर तुलनात्मक अध्ययन किया जाए।

५) मानसिक रोग से से ग्रस्त होने के कारण किसान आत्महत्या करते हैं, ऐसा भी निष्कर्ष दिया जा रहा है। उनके लिए मानसोपचार-शिविरों का आयोजन किया जाना चाहिए, ऐसा भी उन्हें लगता है। एक दाने से सौ दाने पैदा करने का चमत्कार करणे वाला और स्वयं भूका रह कर संसार का पेट भरने वाला किसान मानसिक रोगी कैसे हो सकता है? हाँ, लेकिन संभवत: हारा हुआ हो सकता है। परंतु वह हारा हुआ,निराश क्यों हैं, इसके कारण खोजने चाहिए। वे कारण सामाजिक हैं या आर्थिक इसका भी पता लगाया जाना चाहिए। खेतों में जी-तोड़ मेहनत में बहाया हुआ पसीना‘मूल्य’ में क्यों परिवर्तित नहीं हो सका यह भी खोज निकालें।

६) अज्ञानतावश कुछ किसान आत्महत्या करते हैं, ऐसा कुछ लोगों ने निष्कर्ष दिया है। यदि यह मान लिया जाए, तो ऐसे लोग जो किसान नहीं है, लेकिन अज्ञानी है,आत्महत्या क्यों नहीं करते ?

७) पैकेज से आत्महत्या नहीं रुकती, ये पैकेज के स्वरूप पर निर्भर है। कैंसर के रोगी को पैरासीटेमोल का पैकेज देना और रोगी ठीक नहीं हुआ या मर गया तो वह अज्ञानी था, उसने दवाइयाँ ठीक से नहीं ली, आदि ऐसा कुछ मूर्खतापूर्ण निष्कर्ष निकालने वाली ये सारी बाते हैं। इसके बजाय पैकेज के मूल में ही कही चूक हुई है, रोग की पहचान करने में और दवाईया देने में कोई गलती हुई है यह मान्य करने की उदारता हमारे अंदर कब आ सकेगी यह एक बड़ा सवाल है।


किसान आत्महत्या क्यों करता है? इसकी पड़ताल करते हैं। किसान की आत्महत्या असह्यता है या विकृति इस बारे में बात करेंगे और उसके कारण तलाशने की कोशिश करेंगे, ताकि इस सवाल का जवाब मिले। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है बैंक या साहूकार का कर्जा। उसी प्रकार विद्वानों द्वारा उल्लिखित अनेक कारण भी उसमें सम्मिलित हैं, जैसे- कर्ज का बोझ, नशे की लत, अकाल और सूखा, अनुर्वरता,अपर्याप्त सिंचाई, अपर्याप्त बिजली, कर्ज पर बेहिसाब ब्याज, साहूकारों द्वारा किया गया उत्पीड़न, पारिवारिक विवाद, बढ़ती महंगाई, बाजार मूल्य में गिरावट आदि;इतना ही नहीं आर्थिक तंगी और खिंचतान का बोझ और आने वाले कल की चिंता। ये निश्चित ही मुख्य कारण हैं। इसके साथ ही असामान्य जन को सामान्य प्रतीत होने वाली कृषि पैदावार का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करने की पद्धति भी एक महत्वपूर्ण कारण है। मेरे अनुसार आत्महत्या का तात्कालिक कारण कोई भी हो,लेकिन सभी प्रत्यक्ष कारणों के मूल में अप्रत्यक्ष कारण आर्थिक समस्या ही है। इस सब से कृषि उद्योग में किसान का अस्तित्व संकट में आ गया है । इसलिए आज सही मायनों में किसानों के लिए अर्थक्रांति करने कि आवश्यकता है। उसे पैकेजरूपी सहायता की अपेक्षा स्थायी नीतियों की आवश्यकता है।


नीति आयोजक अर्थव्यवस्था मजबूत दिखाने का कितना ही ढोंग कर ले, लेकिन महत्वपूर्ण कार्यों के लिए यह अर्थव्यवस्था बड़ी ही दुर्बल है, यह बात मेरे जैसा अर्थशास्त्र विषय से अज्ञात व्यक्ति भी निश्चित रूप में कह सकता है। इस प्रचलित अर्थव्यवस्था के खेल बड़े ही न्यारे हैं। रासायनिक उर्वरकों की सबसिडी के नाम पर कंपानीयों और उनसे संबंधितों की जेबें भरी जा रही हैं। कर्ज माफी के नाम पर बैंकों का डूबा हुआ कर्ज वसूल हो जाता है। कृषि संबंधित विभिन्न अनुदान पर नाम गरीब किसान का पर लाभ दूसरों का ही होता है। किसानों की झोली खाली की खाली रह जाती है। यह सत्य है कि स्वतंत्रता के पूर्व भी किसानों को कोई लाभ न मिलता था,लेकिन किसानों के नाम पर हजारों करोड़ रुपये सरकारी तिजोरी से निकलवा कर उस पर पलनेवाले मुफ्तखोर भी उस समय नहीं थे। किसान बीज, खाद, मजदूरी,जुताई किसी भी प्रकार के व्यय के लिए पैसों पर निर्भर नहीं था। वे, घरेलू परंपरागत बीज, जानवरो के एवं अन्य जैविक खाद, अनाज के रूप में मजदूरी आदि के संबंध से स्वावलंबी थे। कृषि तथा अन्य से संबंधित बदलती व्यापारी नीतियों के बीच गरीब और अशिक्षित किसान टिक नहीं पाए और इसलिए स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी और लोकतंत्र होने के बावजूद भी किसान दुर्बल रह गया।


किसान, कर्ज चुकाने के लिए बैंकों का तकाजा, साहूकारों की सीनाजोरी, धमकियाँ आदि सब निरंतर झेलता है। इसीलिए उसके बेचैन मन को भविष्य की चिंता सताती रहती है। आर्थिक समस्या के कारण ये सब चिंताएँ खुले मन से किसी के समक्ष कही भी नहीं जा सकती। इसलिए भीतर के जख्म छुपे रह जाते हैं। अपने हिस्से अब केवल कर्ज का बोझ, बेइज्जती, बदनामी ही आएगी, सब बर्बाद हो गया, इन मानसिक चिंताओं एवं परेशानियों के कारण कई किसान शराब के नशे के आदि हो जाते हैं। परिणामस्वरूप ढलता हुआ स्वास्थ्य, भ्रष्ट बुद्धि और अंत में गलत निर्णय लेकर जीवन त्याग दिया जाता है। एक बार को फसल का नुकसान होने पर वह उसके लिए फिर से मेहनत कर लेगा, फिर से खड़ा हो जाएगा, फिर से बुआई करेगा, फिर से वर्षा की राह तकेगा, लेकिन आत्महत्या नहीं करेगा। बारिश की बाट जोहने में उसे उम्मीद दिखाई देती है, लेकिन जहाँ उम्मीद की छोर खतम हो जाती है, वह उसी मोड पर धीरज खो देता है। इस सब के बीच साहूकार द्वारा तंग करना उसके तनाव कई गुना बढ़ा देता है। उसमें भी यदि बैंकों की कानूनी कारवाई शुरू हो जाए, तो वह पूरी तरह हिम्मत हार जाता है। उसकी मानसिकता पूरी तरह ढह जाती है। अब उसे आर्थिक शोषण का डर सताता है। गरीबी से तंग हो कर भविष्य की चिंता से वह घबरा जाता है। गिरवी रखी हुई जमीने वापस नहीं मिलेगी, कर्ज कभी चुकता नहीं होगा, इस विचार से डर कर वह आत्महत्या का रास्ता चुनता है।


खेती के लिए प्रयुक्त जमीन की कीमत 5 से 50 लाख तक है। लाखों की जमीन गिरवी रख कर भी किसान को 20 से 30 हजार का कर्जा भी न मिल पाए तब इस देश मे प्रमुखतासे बैंकिंग व्यवस्था सही मायनों में किसके लिए है? यह प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाता है। अधिकांश किसान बैंक व्यवहार के मामले में अज्ञानी होते हैं। अर्धशिक्षित, बैंकों पर अति विश्वास, बैंक उन्हें कर्जा देती है अर्थात ‘उपकार करती है’, यह भावना और धारणा किसानों के मन में होती है। कर्ज चुकाने की उन्हें जल्दी होती है, लेकिन प्रकृति के बेवक्त बदलते मिज़ाज के चलते एकाध दुर्घटना होने पर कर्ज चुकाना असंभव हो जाता है। ऐसे में बैंकों से कैसे डील करना चाहिए है, इस संकट से कैसे और क्या रास्ता निकालना है, यह उसे पता ही नहीं होता। यह अज्ञान छोटे किसानों में मुख्यत: होता है। किसानों में भी छोटा-बड़ा-मध्यम किसान ऐसे भेद हैं। मेरी जानकारी में सौ ऐसे किसान है, जिनके कर्ज की रकम मिला ली जाए तब भी कुल मिला कर 5 से 50 लाख भी नहीं होगी अर्थात साधारण: यह कर्ज की रकम प्रति व्यक्ति 50 हजार से 2 लाख है। इनके लिए बड़े से बड़ा कर्ज रु 500000 का है।


किसानों की मदद करना, उनके प्राणों की रक्षा करना, उनके परिवारों को संभालना, यही सही मायनों में मानवता है। और मानव समाज को बचाने की लिए आज के समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। कर्ज के लिए कागजात इकट्ठा करना गरीब और अशिक्षित किसानों के लिए बौद्धिक क्षमता के बाहर का काम है। इस हेतु बैंकिंग प्रक्रिया सहज एवं सरल करने के लिए, और सरकार एवं किसान के बीच आर्थिक व्यवहार के संबंध में तथा किसानों के आश्वस्त संरक्षण के लिए फिलहाल निम्न प्रकार के कुछ छोटे-मोटे उपाय किए जाए तो निश्चित ही कोई रास्ता निकल सकता है-


1. किसानों को अविलंब, बिनाशर्त संपूर्ण रूप से कर्ज मुक्त किया जाए। बिजली का बिल, भूमि कर, शिक्षा शुल्क एवं अन्य सभी प्रकार के सरकारी और गैर-सरकारी कर्ज के बोझ से एवं अन्य देय से बिना शर्त मुक्त किया जाए। खेती के लिए बिजली, पानी, कचरे से निर्मित बायो फर्टिलाइजर्स एवं अन्य प्राकृतिक संसाधन मुफ्त में मुहय्या कीये जाए। रासायनिक खाद, जीएम सीड्स, तृणनाशक,कीटनाशक और अन्य रसायनों के निरंतर प्रयोग से न केवल जमीन की सजीव सृष्टी समाप्त होने के कगार पर है, बल्कि इन सबके स्वास्थ्य हेतु हानिकारक प्रभाव सामने आए हैं। संक्षिप्त साधन संपत्ती होते हुए भी पहले मनुष्य स्वस्थ एवं निरोगी और दीर्घायुषी होता था, लेकिन भौतिक संसाधनों की अतिवृद्धी से, यांत्रिक जीवन और रासायनिक कृषि से उत्पादित अनाज, इन सब के कारण विभिन्न असाध्य व्याधियों ने उसे जकड़ लिया है तथा मनुष्य अल्पायु हो गया है। इस हेतु आवश्यक नीतियों का निर्धारण कर औद्योगिकरण, यांत्रिक एवं भौतिक विकास की गति कम कर, प्रकृति का संवर्धन करते हुए कृषि क्षेत्र में स्थायी विकास साध्य करने की आवश्यकता है। रोगियों के लिए अल्प मूल्य औषधालय की अपेक्षा जैविक औषधि और नॉन जेनेटिकली मॉडिफाइड बीज मुफ्त देने वाले जन कृषि सेवा केंद्रों का निर्माण कर इसके माध्यम से किसानों को बड़े खर्चों से बचाने की आवश्यकता है। इसके द्वारा कृषि में रसायनों के प्रयोग से जनता के स्वास्थ्य को हो रही हानि की रोकथाम आवश्यक है।


2. बंजर या अनुपजाऊ ज़मीनों को ही परियोजना के लिए उपयोग में लाने की नीति आवश्यक थी, लेकिन ऐसा ना हो पाया। कम-से-कम अब वो जमीने कृषि हेतु उपयोग में लेने की वर्तमान समय की आवश्यकता है। सभी परियोजना-पीड़ित भूमिहीन किसानों को सरकारी जमीन बिना किसी मुआवजे के किसानी हेतु दिए जाने पर परियोजना-पीड़ित किसान कृषि उद्योग में ही बना रहेगा और कृषि क्षेत्र में भी बढ़ोतरी होगी।


3. परियोजना-पीड़ित किसानों के लिए नरकतुल्य पीड़ादायी पद्धतियों को प्रयोग में लाना बंद कर उनकी आने वाली पीढ़ी के कल्याण हेतु इस प्रस्ताव के अनुसार मुआवजे की माँग के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाने वाले परियोजना-पीड़ित किसानों को कानूनी प्रक्रिया में अधिक न उलझाकर उन्हें आज वर्तमान में अनुपालित भूमि अधिग्रहण कानून के अनुसार मुआवजा दिया जाए। 15 से 20 सालों पहले के अधिग्रहण के मुआवजे से वह आज तक वंचित रहा है इसलीये उसकी जमीन आज ही अधिग्रहित की गई ऐसा समझा जाए। जो भी मुआवजा दिया गया वह इतने वर्षों से उसकी जमीन पर सरकारी कब्जा होने के कारण वह अपनी उपजीविकासे वंचित रह गया इसलिए भी दिया गया मुआवजा कम ही है, अत: इस सब के लिए इस में कटौती न की जाए।


4. शैक्षिक कर्ज पर ब्याज दर फसल कर्ज से कम रहे। रेहनरहित कर्ज रहे। फिलहाल की चार से छह लाख की कर्ज सीमा बढ़ाकर पाठ्यक्रम एवं शैक्षिक संस्थान के स्तरानुसार शिक्षा पूर्ण करने हेतु सर्वसमवेशी व्यय की सौ प्रतिशत रकम कर्ज के रूप में दी जाए, जिसमें लिमिट का बंधन न रहे।


5. किसानों को रियायती ब्याज दर से एवं आसान तरीके से कम समय में कर्ज उपलब्ध हो इसके लिए बैंकिंग नीति में बदलाव किए जाए। निजी बैंक जिस प्रकार से घर-घर जाकर क्रेडिट कार्ड, कार लोन, पर्सनल लोन और अन्य कर्ज देते हैं, उसी प्रकार से राष्ट्रीयकृत बैंक प्रत्येक गांव के किसानों के घर जाकर कर्ज का वितरण करें। किसानों को अपना काम-धंधा छोड़कर, अपना उत्पादनक्षम समय बर्बाद कर बैंकों में जाने की आवश्यकता न पड़े इसका ध्यान रखा जाए। कर्ज चुकाने के लिए मिलने वाले समयावधि को उत्पादन के समयावधि से तालमेल बैठा कर तय किया जाए। प्राकृतिक आपदा के समय कर्ज का पुनर्वसन तत्काल किया जाए। प्रतिभूति जमा के बिना कर्ज उपलब्ध किए जाए, हायपोथीकेशन, माल रेहन कर्ज, फसल कर्ज की भाँति ही उनकी अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कर्ज का एक स्वतंत्र प्रकार हो। गृह ऋण, शिक्षा ऋण, वाहन ऋण, महिलाओं के कुटीर उद्योग के लिए ऋण, बीमारी, विवाह कार्य आदि हेतु ऋण के प्रावधान हो और ये एवं ऐसी विभिन्न प्रकार की स्वतंत्र कर्ज प्रावधान की अवधि निश्चित की जाए तथा उसका वितरण किया जाए। यह कर्ज अदायगी आसान किश्तों के द्वारा हो और रेहनरहित कर्ज हो।


6. ‘उत्पादक से सीधे ग्राहक तक’ इस दूध आपूर्ति श्रृंखला में सुधार किया जाए। वर्तमान में फिलहाल तत्काल दूध आपूर्ति हेतु कम-से-कम ₹सत्तर से सौ रुपए प्रति लीटर कीमत मिले। हर पशुपालक को मुफ्त पशु आहार और चारा उपलब्ध कराया जाए। ग्रामीण क्षेत्र में जिस जगह दूध उत्पादन होता है, वहां दूध के पैकेट कंपानीयों के बिक्री पर प्रतिबंध लगाए।


7. देसी प्रजाति के गाय का दूध स्वस्थ्यवर्धक और आरोग्यदायी होता है, इसमें किसी प्रकार की शंका नहीं होनी चाहिए। लेकिन देसी गाय के गलत पोषण के कारण उसकी उत्पादनक्षमता शून्यजैसी या शून्य तक पहुँच गई है। ऐसी स्थिति में सरकारी तंत्र को स्वयं इन जानवरों के विधिवत पोषण की ज़िम्मेदारी उठानी चाहिए और विज्ञानियों द्वारा निर्मित अत्याधुनिक तंत्र की सहायता से उनकी उत्पादन क्षमता वृद्धिगत कर प्रति दिन 15 से 20 लीटर करणे का उद्देश्य रखना चाहिए। जब तक ऐसा न हो तब तक सरकार को किसानों और पशुपालकों को देसी गोवंश पालन के लीये अती प्रोत्साहित ना कीया जाय।


8. कृषि उत्पादन का न्यूनतम समर्थन मूल्य निश्चित किया जाए। न्यूनतम समर्थन मूल्य घट-बढ़कर जुए का स्वरूप न लें। यह मूल्य बुवाई के पहले ही तय किए जाए। उत्पाद के बिक्री का मूल्य तत्काल दिया जाए। कृषि एवं दूध उद्योग में‘उत्पादक से सीधे ग्राहक तक’ यह व्यापार पद्धति बनाए रखने की आवश्यता थी। उसमें किसानों द्वारा अपने उत्पाद की कीमत तय करने का अधिकार अबाधित रखा जाता, तो वह स्वयं के बल पर विकास कर सकता था। कृषि उत्पादन बाजार व्यवस्था सरकार ने व्यापारियों के माध्यम से नियंत्रित कर किसानों के नुकसान में बढ़ोतरी की है और कृषि को हमेशा के लिए नुकसानदायी उद्योग बना दिया और इस पर तथाकथित मरहम के रूप में न्यूनतम समर्थन मूल्य की नीति निर्धारित की। न्यूनतम समर्थन मूल्य की उपयोगिता व उसका क्रियान्वयन सर्वज्ञात है। इसलिए एक समय में चाँदी का चम्मच ले कर पैदा होने वाला किसान आज अभागा बन गया है। सभी किसानों के खर्च और उत्पादन एक जैसे नहीं होते। ऐसे में न्यूनतम समर्थन मूल्य के स्वरूप में उत्पादन शुल्क निश्चित करने की कौनसी पद्धति प्रयोग की जाती है? इस संबंध में किसानों की राय लेना आपने उचित नहीं समझा? उत्पादन मूल्य के बराबर न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करना और तो और अपना उत्पाद न्यूनतम समर्थन मूल्य के रूप में अत्यंत न्यून दरों में बिक्री करने के लिए भी किसान को अपना उत्पादनक्षम समय बर्बाद कर के तलवे घिसने के लीये मजबूर करना,क्या सरकार यही चाहती है? इसके उपाय के रूप में बाजार व्यवस्था, किसान के अधिकार क्षेत्र में रहे और फ़िक्स्ड प्राइसिंग पर प्रत्येक वर्ष कर्मचारी वर्ग के वेतन वृद्धि की तुलना में कमतर न रहे इस प्रकार की वृद्धि करने वाली कृषि उत्पादन मूल्य पद्धति कार्यान्वित करने की आवश्यकता है।


9. भारत सरकार की सभी योजनाएँ जनसंचार माध्यमों के द्वारा हर गाँव में पहुचनी चाहिए। सुविधाओं, योजनाओं, परियोजनाओं की गहन जानकारी और आवश्यकता पड़ने पर उनसे संबंधित प्रशिक्षण लाभार्थी ग्रामवासियों तक उपलब्ध हो पाए यह आवश्यक है।


10.कर्ज वसूलने के लिए बैंके कई रास्ते अपना रही हैं। गुंडागीरी, सोशल प्रेशर वसूली, अधिकारी तथा स्टाफ घर के सामने या वसूली दस्ते के साथ घर में आकार गालीगलौच करने तक की घटनाएँ घट रही हैं। घर की वस्तुएँ निकाल कर उन्हें नीलाम करने की धमकी देकर उन्हें परेशान किया जा रहा है। बच्चों के कॉपी-किताबों से लेकर घर के बर्तन तक बाहर फेंके जा रहे हैं। इन सब से अपमान सहना पड़ रहा है और इस सब से परेशान हो कर किसान अंतत: आत्महत्या का रास्ता अपना रहा है। आत्महत्या के लिए उकसाना यह कानूनन जुर्म है। बैंक ये भूल रही हैं। पैसे वसूलने का उन्हें कानूनन अधिकार है, लेकिन कानून को हाथ में लेकर उस अधिकार का दुरुपयोग किया जा रहा है। यह गलत है और इसकी रोकथाम तुरंत करनी चाहिए।


11. सीमित आय के स्रोत होने के कारण अधिकांश ग्रामीण जनता विशेषज्ञ चिकित्सकों के बाह्य शुल्क एवं अन्य छोटे-बड़े चिकित्सा व्यय वहन करने के लीये भी असमर्थ है और सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टर्स उपलब्ध न होने के कारण ग्रामवासी जनता स्वास्थ्य की दृष्टि से निम्न स्तर का जीवन जी रही है। इसके लिए भी यथायोग्य नीतियों का निर्धारण करना आवश्यक है। ग्रामीण क्षेत्र में दक्षतापूर्ण चिकित्सा-सेवा उपलब्ध करना एक चुनौती है। सरकारी अस्पतालों में ये सभी सुविधाएं उपलब्ध करना एक लंबी प्रक्रिया है। इसलिए इसके उपाय के रूप मेंPPP या भागीदारी द्वारा तत्काल उपाय अपेक्षित है। भूमि अधिग्रहण की अनिवार्य अधिग्रहण के रूप में कठोर नीति है, जीवन आवश्यक वस्तु अधिनियम के अनुसार कृषि उत्पादन के मूल्य पर नियंत्रण रखने की नीति है। खान पान से अधिक आवश्यक दवाइयाँ हो या जी एम सिड्स हो इन सब के लिए मूल्य नियंत्रण हेतु कोई भी नीति नहीं है। इस प्रकार हमारे देश में मृत्यु से लड़ने वाले रोगियों और किसानों के जीवन से खेलने वाली नीतियों की सच्चाई समक्ष है। अबकी बार सरकार कृषि उत्पादन के बजाए जीवनावश्यक दवाइयों के उत्पादन करने वाली कंपानीयों के मुनाफे पर अंकुश लगाने वाली नीतियाँ बनाएँ तभी सस्ती दवाईयो के वितरण हेतु “जन औषधि केंद्रों” की आवश्यकता नहीं रहेगी।


किसानों की कई समस्याएँ हैं और उनकी आर्थिक स्थिति भी सर्वज्ञात है। उसकी आय गरीबी रेखा के नीचे है, बल्कि आय नहीं कर्ज ही है। गरीबी रेखा से नीचे मिलने वाली स्वास्थ योजनाओं के लाभ प्राप्ति हेतु उपभोगता परिवार के लिए निर्धारित शर्तों के अनुसार 1. पीला राशन कार्डधारी परिवार 2. अंत्योदय अन्न योजना कार्ड 3. अन्नपूर्णा कार्ड 4. केसरी राशन कार्ड धारक परिवारों को जोतिबा फुले जन स्वस्थ्य योजना(राजीव गांधी जीवनदायी योजना) का लाभ प्रदान किया जाता है। किसानों की वर्तमान स्थिति को देखते हुए किसान परिवारों को सरकार की इन महत्वपूर्ण स्वास्थ्य सेवाओ की लाभ प्राप्ति हेतु और इसमें सरलीकरण के हेतु उन्हें दस्तावेजों की उपलब्ध्ता की शर्तों में न बांधा जाए। किसान के पास 7/12 सहज उपलब्ध दस्तावेज़ है या ऑनलाइन रूप में सहज उपलब्ध है। अत: किसानों को उपर्युक्त शर्तों में “5. किसान परिवार के सदस्य होने पर 7/12 धारक परिवार के सदस्यों को” इस प्रकार स्थान देने से सुविधा होगी और आपातकालीन समय में भाग-दौड़ से बच सकेंगे। ऐसा सुधार करने पर किसान परिवारों को अपने साथ स्वास्थ्य विभाग के सम्मानजनक आचरण की और अपने किसान होने पर गर्वानुभूति होगी।


किसान आत्महत्या बढ़ने पर सरकार पैकेज जारी करती है। ब्याज माफ कर दिया जाता है या कर्ज चुकाने की समायावधि बढ़ा दी जाती है, सह-उद्योग के रूप में दूध व्यापार और सिंचाई सुविधा बढ़ा देना, पैकेज की ये विशेषताएँ किसानों के लिए वास्तव में लाभकारी हो पाती है? देखा जाए तो ये पैकेजेस हमारे लिए कितने उपयुक्त साबित होते हैं? कर्ज चुकाने की अवधि में विस्तार और ब्याज में छूट,लेकिन मूल कर्ज की रकम में छूट कहाँ मिली। शुरू में किसान ने यदि दस हजार का कर्जा लिया होगा, तो मूल कर्ज में ब्याज की बढ़ोतरी हो कर दस हजार के कब बीस हजार हो जाते हैं, पता नहीं चलता। संस्था का बकाया ऋण बढने से संस्था गोते मे न आये इसलीये उस ऋण का नवीनीकरण किया गया और बीस हजार कर्ज किसान के नाम हो गया है। ऐसे ही तीन-चार बार नवीनीकरण होते-होते दस हजार की रकम एक लाख में बदल गई और यह कर्ज चुका पाना किसान की क्षमता से बाहर हो गया। इसलिए बैंक संस्था ने कर्ज का नवीनीकरण करना बंद कर दिया। बकाया ऋण की रकम बढ़ती गई और एक लाख कब ढाई लाख बन गया पता ही नहीं चला। अब पैकेज के माध्यम से अतिरिक्त ब्याज में माफी दे कर एक लाख रुपए का कर्जा चुकाने के लिए कहा जाता है। यह एक लाख किसान कहाँ से लाएगा??


पैकेज का दूसरा हिस्सा अर्थात दूध उत्पादन उद्योग को बढ़ावा देना। दूध उद्योग की हालत पहले से ही खस्ता हैं। दाने-चारे और पशु आहार के मूल्य निरंकुश और दूध की कीमतों पर लगाया गया अंकुश, और तो और उसमें भी योजनाबद्धता के अभाव में दुधारू जानवरों के प्रजातियों के गलत तरीके से पोषण के कारण उनकी उत्पाद-क्षमता में आई गिरावट। इन सभी समस्याओं के बावजूद भी इन के उपाय नहीं हैं, मैं यह नहीं कहता। दूध उद्योग में थोड़ी-बहुत सुधार की आवश्यकता है, इस स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन केवल दूध उद्योग को आधार बना कर किसान को इस विनाशकारी स्थिति से बाहर नहीं लाया जा सकता । आज उसके पास निवेश और क्रेडिट आपूर्ति के लिए क्रेडिट यह दोनों बाते नहीं है। वह किसी तरह बस खेती के सहारे है। कर्ज निकाल कर भैंस खरीदे और गन्ने व रुई के पैसों से किस्त भरे यह संभव नहीं। जब तक ‘उत्पादक से सीधे ग्राहक तक’ इस दूध आपूर्ति शृंखला में सुधार नहीं होता। वर्तमान स्थिति में अविलंब दूध को कम-से-कम 70 से 100 रु प्रति लीटर कीमत नहीं मिलेगि, प्रत्येक पशुपालक को मुफ्त पशु-आहार और चारा नहीं मिलेगा, तब तक दूध उत्पादक किसान को आर्थिक स्थिरता प्राप्त नहीं हो पाएगी। कम-से-कम ग्रामीण इलाकों में जहाँ दूध का उत्पादन किया जाता है, वहाँ दूध पैकेट कंपानीयों द्वारा की जानी वाली पैकेट बिक्री पर रोक लगाना आवश्यक है।


देसी प्रजाति के गाय का दूध स्वास्थ्यवर्धक होता है, इसमें कोई दोराय नहीं होनी चाहिए। लेकिन देसी गायों के गलत तरीके से पोषण के कारण उनकी उत्पादन-क्षमता शून्य जैसी या शून्य तक पहुँच चुकी है। ऐसी स्थिति में सरकारी तंत्र को स्वयं इन जानवरों की विधिवत पोषण की ज़िम्मेदारी उठानी चाहिए और विज्ञानियों द्वारा निर्मित अत्याधुनिक तंत्रों की सहायता से उनकी उत्पादन क्षमता वृद्धिगत कर प्रति दिन 15 से 20 लीटर करणे का उद्देश्य रखना चाहिए। जब तक ऐसा न हो तब तक सरकार को किसानों और पशुपालकों को देसी गोवंश पालन के लीये अती प्रोत्साहित ना कीया जाय। केवल उत्पादन में सक्षम जानवरों के संबंध में योग्य सलाह दें और दूध उत्पादकों के आय पर नजर रख कर उसमें यदि मुनाफे में कमी नजर आती है, तो उसके लिए एक आधुनिक व्यापारी की भांति उस परियोजना को तुरंत योग्य एवं आवश्यक मदत देकर नुकसान से बचाने उद्देश्य होना चाहिए। जानवरों की गुणवत्ता, उत्पादन क्षमता, स्वास्थ्य, दैनिक रख-रखाव, चारा, पोशाक आहार,आवश्यक खर्च, जन्म-मृत्यु प्रमाण, व्यापार का अर्थशास्त्र इस प्रकार दूध उत्पादन में हानी के अनेकों कारण हैं, जिस पर उद्योजक के दृष्टिकोण से कई उपाय करने की आवश्यकता है।


पॅकेजमधली तिसरी सूचना सिंचनाच्या सुविधा वाढविण्याची आहे. सिंचनातून आर्थिक स्थर्य जर शेतकऱ्याला मिळाले असते तर महाराष्ट्रात बागायत शेतकऱ्यांच्या आत्महत्या झाल्याच नसत्या. शेतीला जर वेळेत पाणीपुरवठा झाला नाही, तर त्याचा विपरीत परिणाम त्याच्या उत्पादन खर्चावरही होतो व उत्पन्नावरही होतो. माझ्या शेतात कालव्याचे पानी येते (tail) शेपटी कडील भाग असल्यामुळे पाटचर्‍यातून पानी येत नसल्याचे कारण अधिकारी सांगतात. त्यामुळे आम्ही पटचरिच्या सुरुवातीलाच शेतात एक खड्डा केला त्याठिकाणाहून मोटर पंपाद्वारे ओलीत करतो. लाइट असली की कालव्याला पाणी राहत नाही, कालव्याला पानी असले तेव्हा लाइट राहत नाही ही स्थिति आहे. कालवा सुटणार त्या माहितींनुसार पेरणी करायची परंतु ८ दिवस कालवा उशिरा येणार, फोन करून करून शेतकरी त्रस्त. उत्तर एकच पाणी येणार तेव्हा मिळणार.


बिजली न होने पर कैनल में पानी नहीं रहता, कैनल में जब पानी होगा तब बिजली नहीं होती ऐसी स्थिति बनी रहती है। कैनल से पानी कब छोड़ा जाएगा इस सूचना के मुताबिक बुआई करनी होती है, लेकिन पानी आठ दस दिन देरी से आता है। फोन मिला-मिलाकर किसान परेशान हो जाता है, लेकिन एक ही जवाब मिलता है –पानी आएगा तब मिलेगा।.


खेत में एक कुआं भी है। वहाँ रोज 1 एकर सिंचाई अपेक्षित होती है, लेकिन अचानक बिजली चली जाती है, पूछताछ करने पर जवाब आता है- अभी देखते हैं! फिर से फोन करिए कोई बताता है- ब्रेक डाउन है, दूसरा बताता है- मरम्मत के लिए बंद किया गया। बिजली आधे घंटे के लिए आती है, फिर चली जाती है, पूछने पर बताया जाता है- शाम को 7:00 बजे तक लोडशेडिंग है। सिंचाई तो कम ही हो पाती है, लेकिन मजदूरी के पूरे पैसे देने पड़ जाते हैं। इस प्रकार बिजली विभाग और सिंचाई विभाग के बीच तालमेल जोड़ने में ही किसान का उत्पादन-क्षम समय बर्बाद होने पर भी उपलब्ध संसाधनों के लाभ से उसे वंचित रखा जाता है। क्या इसीलिए उनकी ज़मीनें जबरदस्ती अधिग्रहित की जाती है? हजारों करोड़ की परियोजनाएँ किस लिए और किसके लिए है? क्या किसान हमेशा सरकारी अधिकारियों या कर्मचारियों की शिकायत करता फिरे और सरकारी कार्यालयों में तलवे घिसता फिरे, आप यही चाहते हैं? दृढ़ता से अपनी बात रखने का सामर्थ्य, समय और समझ क्या उनके पास है? क्या इन सारी परिस्थितियों के बावजूद भी किसान आत्मसंयम से काम जारी रखे, यह चाहते हैं ? जब कभी एखाद बार आपकी ट्रेन या फ्लाइट छूट जाए, तब हमारी यात्रा या काम की रूचि खत्म हो जाती है, तब एक ही समय में कई समस्याओं को सामना करने वाला किसान कैसे धैर्य रखेगा?


सिंचाई के नाम पर विभिन्न परियोजनाओं द्वारा हुई दुर्दशा सर्वज्ञात है। मैं स्वयं लगभग तीन परियोजनाओंका पीड़ित किसान हूँ। अतः केवल परियोजना-पीड़ितों की समस्याओं का ज्ञाता ही नहीं, बल्कि उसका भुक्तभोगी हूँ। परियोजना-पीड़ित के रूप में मेरी व्यथा-कथा के पन्ने अधूरे ही हैं। यहाँ संक्षेप मे बात की जाए तो उदाहरण स्वरूप निम्न वर्धा परियोजना के परियोजना-पीड़ितों की पीड़ा संक्षिप्त में बताना चाहूँगा। 1998 के आस-पास इस परियोजना के लिए जमीने अधिग्रहित की गई थी। 2003-4 के दरमियान अंतिम निर्णय पारित किया गया। 2006-7 के आस-पास अंतिम निर्णय के अनुसार औसतन ₹15000 प्रति एकड़ अनुसार मुआवजा देकर जमीने अधिग्रहित कर ली गई। किसानों और ग्रामीणों को खेत और घर से बेदखल किया गया। अधिकांश लोगों को प्राप्त मुआवजा कर्ज चुकाने में चला गया। कुछ समझदार लोगों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका मुआवजा न्यायालयीन प्रक्रिया में खर्च हो गया। कईयों ने उन पैसों से आधा-अधूरा घर बनवाया और किसी तरह से दुर्दशायुक्त पुनर्वास कोलोनीयो मे पुनर्वासित होकर बस गए। कुछ पुनर्वास के शेड में बड़ी दुर्दशा में रहने लगे, तो कुछ आस-पास के शहरों में किराए के घरों में स्थानांतरित हो गए।


ईश्वर ने सबको एक समान बुद्धि, उद्देश्य या शक्ति नहीं दी। किसानों के लिए, प्राप्त राशि से खेत खरीदना संभव नहीं, दूसरे किसी उद्योग में निवेश हो पाए इतनी रकम हात आई नहीं और खेती के बिना दूसरा धंधा जानते नहीं, ऐसे मैं परियोजना-पीड़ित किसान बेरोजगार और दिशाहीन होकर निराशा की गर्त में चले गए। आय हो या ना हो जीवन-यापन में और दैनिक उदरनिर्वाह के लिए पारिवारिक व्यय तो होता ही है। कईयों के हाथ में जो रकम आई वह 50000 से 500000 इतनी ही थी। इतनी रकम में कितनी समय तक जीवन-यापन किया जा सकता है, यह आप स्वयं तय करें। उसमें भी कुछ लोगों ने इसी रकम में से बच्चों के इच्छाओं की खातिर एकाध दुपहिया या दूसरी विलासिता की वस्तुएं खरीदी होगी। कोई काम-धंधा न हो, भले ही आय का कोई साधन ना हो, खर्चा बढ़ता ही जाता है। किसी-न-किसी कारण से,निर्णय से प्राप्त संपूर्ण राशि खर्च हो गई। परियोजना-पीड़ित किसानों का एक बड़ा वर्ग अन्न, वस्त्र, आवास इन आधारभूत सुविधाओं से भी वंचित हो गया। बड़ी संख्या में किसान बेरोजगार हो गए या खेती में मजदूर बन गए। इन कारणों से निर्मित दरिद्र स्थिति के कारण कईं आत्महत्याएँ हुईं, पारिवारिक झगड़े बढ़ कर तलाक हुए,कितने ही बुद्धिमान छात्र शिक्षा से वंचित रह गए, जीवनयापन हेतु आधारभूत सुविधाएं न होने के कारण तथा बेरोजगारी के चलते कितने ही युवाओं के विवाह नहीं हो पाएँ, आर्थिक स्थिति के कारण कितनों की बेटियां अविवाहित रह गई, मेरिट लिस्ट में अपना नाम दर्ज कराने के बावजूद कई छात्र इंजीनियरिंग या डॉक्टरी शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाए और आर्ट कॉमर्स कॉलेजों में पढ़ रहे हैं। सशक्त और अच्छी आय होने के बावजूद भी उनके जीवनयापन और पालन पोषण के साधन और सिर की छत, बल से अधिग्रहित कर ली गई इस कारण कई परिवार बर्बाद हो गए। उद्योग या व्यवसाय करने की अब हैसीयत नहीं रही और जो किसान मजदूरी कर रहे हैं, उन्हें समय-समय पर मजदूरी छोड़ कर तारीख-दर-तारीख कोर्ट में पेश होना पड़ेगा और मजदूरी के दो पैसे भी कोर्ट कचहरी में खर्च करने पड़ेंगे, ऐसी बिकट स्थिति निर्माण हो गई है। न्यायालीन प्रक्रिया और उसके खेल खेलने वाले सरकारी अधिकारी और कर्मचारी तो परियोजना-पीड़ित किसानों के अहित का ठेका उठा चुके हैं।


2006 से 2016 तक चलती आ रही इस न्यायालयीन प्रक्रिया में कई तो उलझने पैदा हुयी। अधिकांश स्थानों पर जमीन के असली मालिक के मृत होने के कारण उत्तराधिकार सिद्ध कर के रिकॉर्ड पर चढ़ाना, उसमें किसी प्रकार विवाद उत्पन्न होने पर होने वाली देरी एवं अतिरिक्त व्यय, इसके बावजूद भी आपसी समझ ना होने पर केस का निरस्त हो जाना। निर्धनता, अशिक्षितता या कानूनी अज्ञानता के कारण अन्य कानूनी गलतियों के चलते केस निरस्त हो कर संपूर्ण जीवन का निवेश और जीवनयापन का एकमात्र साधन अर्थात उसकी संपत्ति से हाथ धो बैठणा। धन और समय गवां कर भी अपनी मांगों से वंचित रह जाना। यदि कोर्ट ने कुछ मांगे मंजूर कर भी ली तो सरकार की ओर से सालों-साल वह रकम अदा नहीं की जाती। कोर्ट की ओर से जब्ती की कार्यवाही करने पर सरकार की ओर से अपील की जाती है और फिर से देरी कर किसानों को परेशान करने के लिए सभी न्यायिक रणनीतियों का दुरुपयोग किया जाता है। इतना होने पर भी सरकार को अपिलेट कोर्ट में अपील करने से पहले कुछ राशि जमा करने के निर्देश होने के बाद भी आखरी समय तक महीनों गिनती से कई सालों तक रकम जमा नहीं की जाती। रकम जमा होने पर भी कोर्ट की ओर से किसानों को सॉल्वेंसी मांगी जाती है। सारी संपत्ति अधिग्रहण होने के बाद असहाय किसान कहां से लाएगा यह सॉल्वेंसी। कोई रिश्तेदार मदद के लिए तैयार हो तो ठीक वरना सालों-साल फिर से या उच्च न्यायालय के निर्णय तक बेचारा किसान अपणेही पैसों से वंचित। वह किसान यदि जीवित बचा तो ठीक वरना, यही क्रम जारी रहता है।


कानूनी कारवाईयो का सामना करते हुए गवाह, कागजी सबूत प्रस्तुत करना,वकीलों एवं अधिकारियों से बात करना, इस सब का तालमेल बिठाना, धैर्य छोड़ चुके, परिस्थितियों से लड़ने वाले, अशिक्षित किसान के लिए ये सब कैसे संभव हो पाएगा? क्या आप अपने जीवनयापन का साधन, घर बेचकर 20-25 साल उसके मुआवजे का इंतजार करते हुए जी पाएंगे? जिन्होंने कोर्ट में न्याय मांगा ही नहीं या जिनकी केसेस टेक्निकल गलतियों के कारण निरस्त हो गई, उनका क्या? क्या यह सब किसी बाहुबली ने बलपूर्वक अपनी मर्जी से भीक्षा तुल्य मुआवजा देकर किसी की उपजीविका और संपत्ति हड़प लेने जैसा नहीं है? इनकी पीढ़ी से पढ़ा-लिखा सदस्य नौकरी खोजने बाहर जाएगा या अपने अधिकारों की मांग करते हुए कोर्ट का दरवाजा खटखटाता रहेगा? आजादी के बाद भी इस दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटनाओं के शिकार समाज की कितनी पीढ़ियों का यह नुकसान है, क्या किसी को इस बात का अंदाजा भी है? प्रशासन की ओर से परियोजना-पीड़ितों की समस्याएं सुलझाए जाएगी यह उम्मीद रखना अर्थात चूहों के विकास के लिए बिल्लियों का चयन करने समान है। परियोजनाओं की समस्याओं से लड़ते हुए अनेक परियोजना-पीड़ितों के अनुभव और समस्याएं बड़ी हृदयद्रावक लगी। मैंने गौतीर्थ नामक परियोजना की शुरुआत की है। यहां हम किसानों को ऑर्गेनिक खेती और पशु संवर्धन का मुफ्त प्रशिक्षण देते हैं। उस माध्यम से भी संपर्क में आने वाले किसानों की व्यथा सुनकर मुझे संसार के सभी दुख छोटे लगने लगे हैं।


किसानों को दिए गए पैकेज आत्महत्या का समाधान नहीं, बल्कि किसानों के जख्मों पर अल्पकालिक मरहम है। 7/12 नील करना भी एक तरह से मरहम है। लेकिन कम-से-कम उसके सिर पर लदा कर्जे का बोझ खत्म कर उसे आधारभूत सुविधाएं प्रदान कर बाजार के मामले में आश्वासित किया जाए, तो किसान अपने जीवन की फिर से नई शुरुआत कर सकेगा। कुछ खोखले बुद्धिवादियों ने “कर्ज-माफी किसानों को अपाहिज बनाएगी” ऐसा हास्यास्पद वक्तव्य भी किया है। कृषि संबंधी उनका अध्ययन कितना गहन है, यह इस वक्तव्य से ही पता चलता है। अंतत: यह सब पैसों का खेल है। सरकारी तिजोरी का पैसा किसी काम में खर्च करने का निर्णय लेते समय कई आर्थिक और राजनीतिक स्तरों पर पापड़ बेलने पड़ते होंगे, इस बात से मैं इनकार नहीं करता, लेकिन किसान इस भयंकर कुचक्र में ऐसे फस गया है कि केवल कर्ज माफी और उत्पादन एवं आय संबंधी उपायों के ये तात्कालिक समाधान मानों उसे इस कैंसर के रोग पर पेरासिटामोल की दवा देने जैसा होगा। कम-से-कम एक बार उसे संपूर्ण कर्ज मुक्ति एवं सभी प्रकार की आर्थिक देय (फिर वह किसी भी प्रकार का हो) मुक्त करने की नितांत आवश्यकता है।


कम-से-कम एक बार यह कुचक्र खंडित कर कृषि में नवीन चैतन्य निर्माण करने की आवश्यकता है। ये सभी और इनके अलावा समय-समय पर आवश्यक लगने वाली श्रेष्ठ एवं उत्तम व्यवस्था तो करनी ही पड़ेगी, लेकिन अनेक तरह से ये स्थितियाँ बहोत बुरी तरहसे नियंत्रणसे बाहर हो चुकी है। व्यवस्था में किए गए सभी सुधार और उपायों के परिणाम सामने आने में कई वर्षों का समय लग सकता है। इसलिए स्वतंत्रता के बाद जिस पीड़ित और शोषित समाज विशेष को मुख्य सामाजिक धारा में लाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई और उसी वजह से तत्कालीन कुछ पीड़ित शोषित समाज आज मुख्यधारा में सम्मिलित होते दिखाई दे रहे हैं। इसी प्रकार की आरक्षण नीति किसानों के लिए भी करने की आवश्यकता है।


भारतीय संविधान के उद्देशिका के अनुसार भारत सार्वभौम, समाजवादी,धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, प्रजासत्ताक है। उद्देशिका फ्रेंच क्रांती के आदर्शों का अनुसरण करती हुई जनता को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय आचार-विचार, धर्म, श्रद्धा का स्वातंत्र्य और राजनीतिक समानता एवं समान अवसर देने का अभिवचन देती है। इस संविधानिक विषय से और अभिवचन से किसानों को वंचित रखा जाए, ऐसा कौन-सा पाप अन्नदाताने किया होगा? भारतीय संविधान के चौथे खंड में राज्य एवं संघ के स्तर की सभी सरकारें उसी प्रकार संसद/विधानसभा इनके लिए मार्गदर्शक तत्व उल्लिखित हैं। इसमें सामाजिक अधिकार, जैसे- कार्य का अधिकार, शिक्षा व कल्याण अधिकार, जीवनस्तर के विकास हेतु सरकार के सामाजिक दायित्व, मनुष्य को सुलभतासे कार्य करने हेतु अनुकूल कार्यस्थल (Human working conditions and appropriate environment) आदि अधिनियम 43 के अंतर्गत सम्मिलित है। अधिनियम 45 के अनुसार 14 वर्ष की आयु तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देना सरकार का दायित्व है। अधिनियम 46 के अनुसार समाज के पिछड़े वर्ग की उन्नति के लीये सरकार बाध्य है। क्या फिर किसानों के जीवनस्तर के विकास के दायित्व की व्यवस्था संविधान में नहीं है?उसके कार्यस्थल पर उसे कार्य करने हेतु अनुकूल वातावरण निर्मिती के संबंध में क्यों ध्यान नहीं दिया जा रहा? क्या इतनी संघर्षमय स्थिति में भी जीवन जीने के लिए बाध्य किसान नर्कसमान जीवन का अंत करते हुवे आत्महत्या करने वाला समाज पिछड़ा नहीं है ? क्या फिर इनकी उन्नती के लिए सरकार बाध्य नहीं है? किसानों के बच्चों को जातिप्रमाणपत्र के बदले सात-बारा के आधार पार आँगनवाडी से लेकर इंजीनियरिंग या डाक्टरी शिक्षा मुफ्त प्रदान करने की व्यवस्था क्यों न हो?


खेती में सहयोग कर अपनी बची हुई शारीरिक क्षमता और समय देकर ग्रामीण क्षेत्रों के साधारण संसाधन से युक्त शैक्षिक संस्थाओं से शिक्षा ग्रहण करने वाले ग्रामीण विद्यार्थी और भौतिक संपत्ति का सुख भोगने वाले अत्याधुनिक संसाधन एवं विकसित शिक्षण प्रणाली के पाठ्यक्रम से शिक्षा ग्रहण करने वाले शहरी विद्यार्थी, ऐसे दो वर्ग बन गए हैं। विभिन्न पृष्ठभूमि से आए विद्यार्थियों को एक ही मंच पर शहरी शिक्षण स्तर से स्पर्धा करनी पड़ती है, जिस कारण ग्रामीण किसान परिवार से आने वाले विद्यार्थी इस प्रतिस्पर्धा में नहीं टिक पाते और अपवाद स्वरुप कुछ विद्यार्थियों को सफलता मिलती भी है, तब भी आर्थिक स्थिति खराब होने की वजहसे वे उच्चशिक्षा से वंचित रह जाते हैं। क्या ऐसे पारिवारिक समस्याओं से निकलकर अभियांत्रिकी,चिकित्सा या कॉन्पिटिटिव एग्जाम में उत्तीर्ण विद्यार्थी आ पाएंगे? इस पर अपवाद स्वरुप उदाहरण प्रस्तुत करना क्या सही है? क्या शिक्षा में, नौकरी में और पदोन्नति में आरक्षण प्राप्त करने के लिए यह पीड़ित, शोषित एवं उपेक्षित समाज पात्र नहीं है?क्या इन्हें इनके सामाजिक व शैक्षिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण नहीं मिलना चाहिए?


यह बात ठीक है की आरक्षण यह केवल गरीबी हटाओ योजना भर नहीं है, बल्कि सभी उपेक्षित एवं पिछड़े समाज वर्ग को सरकारी एवं राजकीय निर्णय प्रक्रिया में सम्मिलित करने के लिए एवं समानता का तत्व निर्बाध रखने के लिए है। संविधान के अनुच्छेद 15(4) एवं 16(4) के संबंध में विचार करने पर आरक्षण प्राप्त करने के लिए 1) समाज के जिस समूह को पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है, 2) जो अनुसूचित जाति एवं जनजाति परिवार के सदस्य हैं या सामाजिक एवं शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हैं वे ही पात्र हैं।


समाज में जाति व्यवस्था के संबंध में विचार करने पर बढ़ई काम करने वाला बढ़ई समाज, माली काम करने वाला माली समाज, कुम्हार काम करने वाला कुम्हार समाज, धोबी काम करनेवाला धोबी समाज है, तब कृषि काम करने वाला कृषि/किसान समाज क्यों नहीं? फिर किसान को स्वतंत्र जाति के रूप में क्यों नहीं देखा जा सकता? क्या इस संपूर्ण परिस्थिति में किसान सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टिकोण से पिछड़ा नहीं बना है? क्या तब भी किसान को संविधानिक अधिनियम के अनुसार आरक्षण नहीं मिल सकता?


इसके अलावा दूसरे पक्ष से विचार करने पर ‘जय जवान जय किसान’ इस घोषणा के अनुसार सैनिक और किसान को एक समान सम्मान दिया जाता है। सेना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सैनिकों को समाज में आदर एवं प्रतिष्ठा का स्थान प्राप्त होता है। सैनिकों को सरकार द्वारा आकर्षक रियायतों के साथ शिक्षा में आरक्षण दिया जाता है। यदि सैनिक सीमा पर देश की रक्षा करने के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने के लिए तैयार रहता है, तो देश की भूख मिटाने के लिए हमेशा नुकसान का उद्योग कर फासी पर लटककर प्राण त्यागने वाला, जंगली जानवरों के हमले में अपने प्राण गँवाने वाला एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से निम्न स्तर का जीवनयापन करते हुए कभी-कभी कृषि औषधियों की विषबाधा से अपने प्राण गँवाने वाला किसान समाज क्या व्यवस्था का बली नहीं चढ़ा है? सेना के जवानों की कार्य की तरह ही किसानों के परोपकार को त्रिवार अभिवादन क्यों न किया जाए? क्यों सेना की तरह ही किसानों को सामाजिक मान-सम्मान एवं सरकारी सुविधा एवं रियायते नहीं मिलनी चाहिए? हमेशा नुकसान का उद्योग कर देश की भूख मिटाने वाले, देशवासियों का पेट भरने वाले किसान को उसका उद्योग नुकसान से बाहर निकालने के लिए कुछ रियायते नहीं देनी चाहिए? स सम्मान का जीवन यापण हेतु एवं जीवन का स्तर बढ़ाने हेतु किसान को आरक्षण क्यों नहीं दिया जाना चाहिए?


किसान, आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक असमानता का भुक्तभोगी रहा है। असमानता की दरार भरने के लिए उसे आरक्षण की अत्यंत आवश्यकता है। इसके लिए संक्षेप में आरक्षण का स्वरूप निम्न प्रकार से होना चाहिए- १) विभिन्न सरकारी योजनाएं जिस प्रकार आरक्षण अनुसार आरक्षित वर्ग को मिलती है, उसी प्रकार किसान को आरक्षण देकर ये विविध लाभदायक योजनाएं किसानों तक पहुंचाई जाए।

२) खेती में सहयोग कर अपनी बची हुई शारीरिक क्षमता और समय देकर ग्रामीण क्षेत्रों के साधारण संसाधन से युक्त शैक्षिक संस्थाओं से शिक्षा ग्रहण करने वाले ग्रामीण विद्यार्थी और भौतिक संपत्ति का सुख भोगने वाले अत्याधुनिक संसाधन एवं विकसित शिक्षण प्रणाली के पाठ्यक्रम से शिक्षा ग्रहण करने वाले शहरी विद्यार्थी,ऐसे दो वर्ग बन गए हैं। विभिन्न पृष्ठभूमि से आए विद्यार्थियों को एक ही मंच पर शहरी शिक्षण स्तर पर स्पर्धा करनी पड़ती है, जिस कारण ग्रामीण किसान परिवार से आने वाले विद्यार्थी इस प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाते और अपवाद स्वरुप कुछ विद्यार्थियों को सफलता मिलती भी है, तब भी आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण वे उच्चशिक्षा से वंचित रह जाते हैं। इस स्थिति में मजबूरी में खेती करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं होता। इस तरह परिवार में बढ़ते सदस्यों की संख्या कृषि उद्योग में शामिल होती है, जिस कारण छुपी बेरोजगारी बढ़ रही है। इस पर उपाय के रूप में शिक्षा में प्रवेश हेतु, नौकरी हेतु एवं पदोन्नति हेतु किसान परिवार के सदस्यों को समान सामाजिक न्याय देते हुए आरक्षण दिया जाए और संपूर्ण शिक्षा मुफ्त दी जाए, तो छुपी बेरोजगारी कम होगी उसके साथ ही किसानों के निम्न सामाजिक जीवन स्तर के सुधार में मदद होगी और शैक्षिक पिछड़ापन कम करने में मदद मिलेगी।

३) किसानों के बच्चों द्वारा 7/12 एवं परियोजना-पीड़ित होने पर इसका प्रमाण पत्र प्रस्तुत किए जाने पर आँगनवाडी से अभियांत्रिकी या चिकित्सकीय शिक्षा प्राप्त होने की व्यवस्था इस आरक्षण के माध्यम से की जाए।

४) आरक्षण देते हुए, ‘जिनके पास 7/12 प्रमाणपत्र उपलब्ध है और जो प्रत्यक्ष रुप में कृषि उद्योग में संलग्न है या जिनकी जमीन अनिवार्यता से अधिग्रहित की गई, ऐसे परियोजना-पीड़ित’ परिवार के सदस्य इस प्रकार किसान की परिभाषा की जाए।

५) वह वास्तव में खेती करता है या नहीं यह जांचने के लिए सैटेलाइट प्रणाली या महसूल एवं कृषि विभाग के विभाग यंत्रणा के माध्यम से जांच पड़ताल की जाए, तभी उस किसान को आरक्षण प्रदान किया जाए।

६) औद्योगिकरण एवं विकास के नाम पर प्रकृति को पहुचाई गयी क्षति के परिणामस्वरूप प्रकृति में जो बदलाव आए हैं, उस कारण से होने वाले नुकसानों से किसानों का बचाव करने के लिए फसल बीमा योजना शुरू की गई। इसकी भी उपयोगिता, इससे प्राप्त होणेवाली भरपाई एवं भरपाई की मांग हेतु किसानों की होने वाली परेशानी, कर्ज लेनेवाले किसानों का सक्ती के फसल बीमा में होने वाला उत्पीड़न और किसानों का अहित करके कंपनीयों की हितरक्षा करना, फसल बीमा योजना की यही पहचान बनकर रह गयी है। जिन किसानों ने फसल बीमा करवाया है उन्हें ही उसका लाभ प्राप्त नहीं हो रहा यही सच्चाई है, फिर जिन किसानों ने फसल बीमा कराया ही नहीं ऐसे किसानों के प्राकृतिक आपदा के कारण होने वाले नुकसान का क्या? इसीलिए प्राकृतिक आपदा के समय किसान के सकल कृषि उत्पाद के मूल्य के तुल्य संरक्षण सरकार द्वारा प्रदान करने पर बार-बार कर्ज मुक्ति की मांग नहीं उठेगी। फसल बीमा जैसी आधी-अधूरी योजना फसल बीमा कंपानीयों को लाभदायी सिद्ध होती है। ऐसे समय में किसान हिम्मत ना हारे इसलिए आरक्षण में ही प्राकृतिक आपत्ति के समय सकल उत्पादन मूल्य के फसल संरक्षण की व्यवस्था की जाए।

७) जिस प्रकार स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सामाजिक असमानतापर आरक्षण देते समय समिति या आयोग स्थापित कर आरक्षण के संबंध में सर्वांगीण अध्ययन किया गया उसी प्रकार आयोग गठित कर अध्ययन अनुसार आवश्यक ऐसी सभी बातों को सम्मिलित कर किसानों को आरक्षण दिया जाए।

किसी भी विशेष काल या वर्तमान की सरकार को दोष देने का मेरा कोई उद्देश्य नहीं है और इसमें किसी का दोष भी नहीं है। यह सारी प्राकृतिक एवं अप्रत्याशित रूप से निर्मित परिस्थिति है। सरकार अपनी ओर से विकास के लिए प्रयत्नशील रहती है, परंतु उस व्यवस्था से कभी-कभी अनजाने में किसानों जैसा समाज पीड़ित होता है। ऐसे समय में ऐसे समाज/वर्ग को जीवन का आनंद लेने योग्य वातावरण एवं परिस्थिति तैयार करने का कार्य सरकार को करना चाहिए। बुद्धिजीवी, राजनीतिक, प्रशासनिक अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता, नीति निर्माता एवं नीतियों को प्रभावित करने वाले समस्त लोगों को इस मुद्दे को वरीयता देते हुए इसपर ध्यान देने की नितांत आवश्यकता है। वर्तमान परिस्थिति में किसानों के लिए आरक्षण यही एकमात्र दीर्घकालिक विकासात्मक उपाय योजना है। अत: आपसे अनुरोध है कि आप यथाशक्ति अपनी ओर से इस संबंध में योग्य एवं आवश्यक कार्यवाही करें।